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Saturday, 10 October 2026

वरिष्ठ चिकित्सक व साहित्यकार डॉ. सच्चिदानंद मिश्र का निधन

दैनिक सत्ता मंत्र
सिद्धार्थनगर। जिले के वरिष्ठ चिकित्सक, साहित्यकार और समाजसेवी डॉ. सच्चिदानंद मिश्र का सोमवार सुबह 95 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन की खबर मिलते ही चिकित्सा, साहित्य और सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। चिकित्सकों, साहित्यकारों, सामाजिक संगठनों और उनके शुभचिंतकों ने शोक व्यक्त करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। डॉ. सच्चिदानंद मिश्र जिले के सबसे वरिष्ठ चिकित्सकों में शामिल थे। उन्होंने अपने जीवन के कई दशक चिकित्सा सेवा को समर्पित किए। उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद मरीजों की सेवा के प्रति उनका समर्पण कम नहीं हुआ। वह अंतिम समय तक मरीजों का उपचार करते रहे। प्रतिदिन करीब एक घंटे तक जरूरतमंद मरीजों का निरूशुल्क उपचार करना उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा था। उनका मानना था कि चिकित्सा महज पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा का महत्वपूर्ण माध्यम है। चिकित्सा के साथ साहित्य में भी बनाई पहचान चिकित्सा क्षेत्र में योगदान के साथ डॉ. मिश्र का साहित्य से भी गहरा जुड़ाव रहा। उन्होंने सामाजिक सरोकारों, मानवीय मूल्यों और जीवन के विभिन्न पहलुओं को अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त किया। उनकी चर्चित पुस्तक ‘ईश्वर मर चुका’ ने उन्हें साहित्य और चिंतन के क्षेत्र में अलग पहचान दिलाई। उनके विचारों में समाज की समस्याओं और मानवीय संवेदनाओं की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी। डॉ. मिश्र का व्यक्तित्व चिकित्सा, साहित्य और सामाजिक सेवा का अनूठा संगम था। उन्होंने अपने लंबे जीवन में सादगी और सेवा को विशेष महत्व दिया। उनके संपर्क में आने वाले लोग उनके सहज व्यवहार और मरीजों के प्रति संवेदनशीलता को हमेशा याद करते रहेंगे। जिले ने खोया बहुआयामी व्यक्तित्व उनके निधन को जिले के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। चिकित्सा जगत से जुड़े लोगों ने कहा कि डॉ. मिश्र ने जिस समर्पण के साथ लंबे समय तक मरीजों की सेवा की, वह नई पीढ़ी के चिकित्सकों के लिए प्रेरणादायी है। साहित्यिक जगत से जुड़े लोगों ने भी उनके निधन को बड़ी क्षति बताया। 95 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस लेने वाले डॉ. सच्चिदानंद मिश्र अपने पीछे सेवा और साहित्य की ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा। जिले के लोग उन्हें एक ऐसे वरिष्ठ चिकित्सक और साहित्यकार के रूप में याद रखेंगे, जिन्होंने जीवन के अंतिम पड़ाव तक मरीजों की सेवा को अपना धर्म माना।

लेखक
asif.ali27march
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